Thursday, April 2, 2015

करें न करें, कहना ज़रूरी है।

दिल्ली की धूप आदमी को यूँही चिड़चिड़ा बना देती है; और अगर आप स्वयं को विचारक मान बैठे हों तो मुमकिन है की इसकी अभिव्यक्ति या तो सरकार के प्रति रोष या मानव स्तिथि के प्रति अति संवेदनशील भाव में होगी। बात ऐसी ही एक गर्म दोपहर की है जब मैं और मेरे मित्र रिक्शे पे बैठे कहीं जा रहे थे जब एकाएक ही वह भड़क उठे।

'यार इस महंगाई का क्या होगा? सरकार ने तो मानो हाथ खड़े कर लिए हैं। अब आप ही सोचिये की पिछले छः महीनो में खाने की हर चीज़ महँगी हो चुकी है। ऐसे में गरीब क्या करे? खाना न मिले तो आदमी कमज़ोर हो जाता है, कमज़ोरी में उसे रोग धर-दबोचता है और आजकल तो रोग भी इतने महंगे हो गए हैं की क्या बताऊँ! साल दर साल लोगों की आमदनी बढे न बढे, रोग ज़रूर बढ़ जाते हैं। अब आप बताइये की जहां बच्चा दूध न पी पाता हो, ऐसे में महंगे रोग हो जाएँ तो किया क्या जाए? दवाइयाँ भी तो कितनी महँगी आती हैं। मैं तो कहता हूँ की किस काम के हैं ये खाद्य भण्डार जब सरकार महंगाई कम करने के लिए उसका उपयोग ही न करे। अरे भाई जब लोग मर रहे हैं तो दे दो खाना, स्टॉक है संसद की सीट थोड़ी जो कुंडली तले दबा रखा है। सब साले लूटने बैठे हैं!'

उनकी बात कई मुद्दों को आपस में मिला गयी। शायद यही वह गुण है जो लोगों को विचारक होने के भ्रम में डाल देती है। मैंने भी हामी भर दी, भला इस धुप में बहस कौन करे? उधर रिक्शा वाला चुपचाप पेडल पर पाँव मारे चला जा रहा था। उसकी उम्र हो चुकी थी और बदन किसी ढांचे समान रिक्शा घींच रहा था।

आगे मोड़ पे एक गाडी वाले से भिड़ंत होते होते बची। गलती गाड़ीवाले की थी पर उसने दो चार बातें रिक्शा वाले को ही सुना दी। भला इस धुप में बहस कौन करे? पर मेरे मित्र मुझे समझाने लगे।

'देखा आपने पैसे का गुरूर? उसे पता था की यह रिक्शा वाला कुछ न कर सकेगा और अगर पुलिस आई तो इसे ही दो डंडे लगाएगी। इसी घमंड में सुना गया वो बातें। और इस बेचारे गरीब को भी यह भली भांति मालूम है इसलिए यह भी चुप सुनता रहा। मानव संवेदना तो मानो लुप्त हो चुकी है समाज से। कौन सुनेगा इनकी और बात एक तरह से सही भी है, आखिर कोई क्यों सुने इनकी? सबकी अपनी परेशानियां हैं और यह भी तो कम आलसी नहीं हैं। अरे भाई अगर अपने हक़ के लिए खुद नहीं लड़ोगे तो कोई क्या कर सकता है? मेरा तो मन कुपित हो उठता है इनकी व्यथा देखकर पर जब यह खुद कुछ नहीं करते तो मैं क्यों पडूँ इनके झमेले में? "गरीब हो या नपुंसक?" वह रिक्शा वाले से पूछ बैठे'

रिक्शा वाला पसीने से तर चुपचाप चलता रहा। उनकी बातें अनसुनी कर। मैंने भी अपने मित्र से कुछ नहीं कहा। भला इस गर्मी में बहस कौन करे?

'अरे महंगाई और गरीबी को छोड़िये और मौसम को ही देख लीजिये। सुना है पिछले 20 साल में ऐसी गर्मी नहीं पड़ी, कई राज्यों में तो सूखे के आकाल के लक्षण अभी से दिखने लगे हैं। इन भिखारियों को ही देख लीजिये, अगले महीने तक 10-15 तो परलोक सिधार ही जायेंगे। दुःख होता है मुझे यह देखकर पर मैं अकेला कर भी क्या सकता हूँ? सरकार को कुछ तो करना चाहिए। बताइये, सरकार तो अब इन्हें आराम से मारने छोड़ देती है और साल के अंत में कहती है की फलां प्रतिशत गरीबी कम हो गयी है। गरीबी हटाओ से गरीब हटाओ पे आ चुके हैं। वे इसका श्रेय भी लेते हैं, इनकी मौत का नहीं, 'गरीब घटाने' का। मैं तो इन चीज़ों को करीब से देखता हूँ इसलिए बता रहा हूँ।'

मैंने कृतज्ञता जताते हुए फिर हामी भर दी। 20-25 मिनट बाद हम अपने तय स्थान पे पहुंचे तो उतरकर उन्होंने रिक्शा वाले से भाड़ा पूछा। 30 रूपए। रिक्शा वाले को कस के डांटा- 'उल्लू समझते हो? 20 रूपए होते हैं, ज़्यादा होशियार बनने की ज़रुरत नहीं है।' उसे 20 रूपए पकड़ाकर मेरी तरफ देखकर बोले- 'देख रहे हैं न आप? सब साले लूटने में लगे हैं।

मैंने रिक्शा वाले को देखा। वह भी चुपचाप खड़ा शायद यही सोच रहा था।

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